Premium Notes Library
36
CGपरीक्षामित्र
SMART STUDY HUB
Complete Coverage

बस्तर का इतिहास एवं जनजाति विद्रोह (History of Bastar & Tribal Revolts)

CGPSC और व्यापम की परीक्षाओं के लिए छिंदक नागवंश, काकतीय वंश एवं प्रमुख जनजातीय विद्रोहों (भूमकाल, परलकोट आदि) का स्मार्ट नोट्स संकलन।

बस्तर का छिंदक नागवंश

सामान्य परिचय

  • शासनकाल: 1023 से 1324 ई. तक।
  • राजधानी: चक्रकोट (बारसूर क्षेत्र दंतेवाड़ा)।
  • उपाधि: भोगवतीपुरेश्वर।
  • स्त्रोत: एर्राकोट से प्राप्त तेलगु व टेमरा शिलालेख से प्राप्त सती स्मारक लेख।
  • ध्वज: सर्प चिन्ह। राज चिन्ह: बाघ व बाघ शावक।

प्रमुख शासक

  1. नृपति भूषण (संस्थापक)
  2. धारावर्ष
  3. मधुरान्तक
  4. सोमेश्वर प्रथम
  5. कन्हरदेव प्रथम
  6. राजभूषण सोमेश्वरदेव द्वितीय
  7. जगदेव भूषण नरसिंहदेव (माणिक्य देवी का उपासक था)
  8. कन्हरदेव द्वितीय
  9. जयसिंह देव प्रथम
  10. हरिशचंद्र (अंतिम शासक)

काकतीय वंश

  • शासनकाल: 1324-1961 ई.
  • शासन क्षेत्र: बस्तर
  • संस्थापक: अन्नमदेव
  • अंतिम शासक: प्रवीरचंद्र भंजदेव
  • कुल देवी: दंतेश्वरी देवी

राजधानियां एवं शासक

  • 1. मंघोता: अन्नमदेव
  • 2. चक्रकोट / बस्तर: पुरुषोत्तम देव, दिगपालदेव
  • 4. जगदलपुर: दलपत देव

काकतीय वंश के प्रमुख शासक

अन्नमदेव (1324-1369 ई.)

  • राजधानी: मंधोता (बस्तर)।
  • अन्नमदेव ने अपनी कुलदेवी की प्रतिमा दंतेवाड़ा जिले में शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम स्थल पर तराला ग्राम में दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण करवाया।
  • बस्तर के लोक गीतों में इसे चालकी वंश नाम से संबोधित किया गया है तथा चालुक्य वंश के नाम से जाना जाता है।

पुरुषोत्तम देव (1468-1534 ई.)

  • बस्तर में विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा एवं गाँचा पर्व का प्रारंभ इन्हीं के द्वारा किया गया।

दलपतदेव (1731-1774 ई.)

  • दलपतदेव ने अपने नाम से दलपत सागर तालाब/झील (पूर्व नाम-भूपाल ताल) का निर्माण कराया। वर्तमान में छ.ग. का सबसे बड़ी झील दलपत सागर है।

अजमेर सिंह (1774-1777 ई.)

  • इन्हें बस्तर क्षेत्र में क्रांति का मसीहा कहा जाता है।
  • इस विद्रोह (हल्बा विद्रोह) के बाद काकतीय वंशीय शासन मराठों के अधीन आ गया।

दरियादेव (1777-1800 ई.)

कोटपाड़ की संधि (6 अप्रैल 1778):

  • इस संधि द्वारा इस राज्य का बस्तर क्षेत्र मराठा नियंत्रण में आ गया।
  • दरियादेव के शासनकाल में ही बस्तर क्षेत्र छत्तीसगढ़ का अभिन्न अंग बना।

रुद्रप्रतापदेव (1891-1921 ई.)

  • उपाधि: 'सेंट ऑफ जेरूसलम' ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा दी गई थी।
  • जगदलपुर नगर नियोजन के कारण इसे चौराहों का नगर कहा जाता है।
  • इसके शासन काल में गुण्डाधुर के नेतृत्व में 1910 ई. में बस्तर का प्रसिद्ध भूमकाल विद्रोह प्रारंभ हुआ।
  • बस्तर में घैटीपोनी प्रथा (महिलाओं के क्रय-विक्रय से संबंधित) की शुरूआत हुई।

प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921-1936 ई.)

  • छ.ग. की एकमात्र महिला शासिका।

प्रवीर चंद्र भंजदेव (1936-1966ई.)

  • अंतिम काकतीय शासक।
  • इनके नाम पर छ.ग. शासन द्वारा तीरंदाजी के क्षेत्र में पुरस्कार दिया जाता है।
  • छत्तीसगढ़ के रियासतों के विलीनीकरण के समय बस्तर रियासत के इस शासक ने समझौते पर हस्ताक्षर किया था।

जनजाति विद्रोह

1. हल्बा विद्रोह (1774-1777 ई.)

  • स्थान: बस्तर। शासक: अजमेर सिंह।
  • कारण: अजमेर सिंह एवं दरियादेव के मध्य उत्तराधिकार का युध्द हुआ।
  • यह विद्रोह चालुक्य राज (काकतीय वंश) के पतन के लिए उत्तरदायी था।

2. परलकोट विद्रोह (1824-1825 ई.)

  • नेतृत्वकर्ता: गेंदसिंह (परलकोट का जमींदार)। पदवी: भूमिया।
  • उद्देश्य: अबूझमाड़ियों को शोषणमुक्त कराने हेतु। अबूझमाड़िया ऐसे संसार की रचना करना चाहते थे जहां कोई शोषण न हो।
  • प्रतीक: धावड़ा वृक्ष की टहनी।
  • परिणाम: गेंदसिंह को फांसी (20 जनवरी 1825)।

3. तारापुर विद्रोह (1842-1854 ई.)

  • दीवान: बैजनाथ पण्डा।
  • नेतृत्वकता: दलगंजन सिंह (तारापुर परगना प्रमुख)।

4. मेरिया/मेड़िया विद्रोह (1842-1863 ई.)

  • नेतृत्वकर्ता: हिड़मा मांझी।
  • नोट: दंतेश्वरी मंदिर में नरबलि प्रथा प्रचलित थी। जिसमें दी जाने वाली बलि को मेरिया कहते थे।

5. लिंगागिरी विद्रोह (1856 ई.)

  • शासक: भैरमदेव। नेतृत्वकर्ता: धुरवा राम माड़िया।
  • नोट: लिंगागिरी विद्रोह बस्तर का महान मुक्ति संग्राम कहलाता है।

6. कोई विद्रोह (1859 ई.)

  • नेतृत्वकर्ता: नागुल दोरला (पोतेकला के जमींदार)।
  • उद्देश्य: साल वृक्ष की कटाई को रोकने हेतु।

7. मुड़िया/मुरिया विद्रोह (जनवरी 1876 ई.)

  • शासक: भैरमदेव। नेतृत्वकर्ता: झाड़ा सिरहा।
  • कारण: अंग्रेजों की आटोक्रेसी नीति एवं गोपीनाथ कपड़दार को दीवान बनाना।
  • नोट: इस विद्रोह में मुड़िया जनजाति के लोग प्रमुखतः से भाग लिये थे। 1867 में बस्तर क्षेत्र में दीवान के रूप में गोपीनाथ कपड़दार की नियुक्ति हुई जो जनजाति शोषण के लिए कुख्यात था।

8. भूमकाल विद्रोह (फरवरी 1910 ई.)

  • शासक: रूद्रप्रतापदेव।
  • नेता: लालकालेन्द्र सिंह, रानी स्वर्ण कुंवर, कुंवर बहादुर सिंह, गुंडाधुर।
  • नेतृत्वकर्ता: रानी स्वर्णकुंवर व दीवान लाल कालेंद्र ने इस विद्रोह का नेतृत्व गुण्डाधुर (नेतानार के जमींदार) के हाथों सौंपा।
  • शुरूआत: पुसपाल बाजार से।
⚡ Active Recall • तुरंत स्व-मूल्यांकन

🎯 अभी इसी टॉपिक के 5 प्रश्न हल करें (Instant Topic Quiz)

विषय: छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास एवं कलचुरी राजवंश (Kalchuri Dynasty) — ऊपर पढ़े गए नोट्स की तुरंत जाँच करें!

आपका लाइव स्कोर
0 / 5
अभ्यास प्रश्न #1 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 1: रतनपुर के कलचुरी वंश की स्थापना (1000 ई.) किस शासक ने की थी और उनकी प्रारंभिक राजधानी क्या थी?

अभ्यास प्रश्न #2 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 2: सिरपुर के प्रसिद्ध "लक्ष्मण मंदिर" (लाल ईंटों से निर्मित) का निर्माण किस पांडुवंशीय शासक के काल में प्रारंभ हुआ था?

अभ्यास प्रश्न #3 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 3: कलचुरी काल में छत्तीसगढ़ में "छत्तीस गढ़ों (36 किलों)" का शिवनाथ नदी के आधार पर 18-18 गढ़ों में विभाजन किसके शासनकाल में हुआ?

अभ्यास प्रश्न #4 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 4: किस कलचुरी शासक ने सोने, चांदी और तांबे के सिक्के चलवाए जिन पर "श्रीमद् जाजल्लदेव" एवं "गजशार्दूल" अंकित था?

अभ्यास प्रश्न #5 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 5: कवर्धा में "भोरमदेव मंदिर" (छत्तीसगढ़ का खजुराहो) का निर्माण 1089 ई. में किस फणीनागवंशीय शासक ने कराया था?

👆 किसी भी विकल्प पर क्लिक करके अपना उत्तर जांचें।