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छत्तीसगढ़ का इतिहास (History of Chhattisgarh)

CGPSC और व्यापम की परीक्षाओं के लिए प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकालीन राजवंशों (कल्चुरी, सोमवंश, शरभपुरीय आदि) का सबसे महत्वपूर्ण और स्मार्ट नोट्स संकलन।

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प्रागैतिहासिक काल से गुप्त काल

कालस्थल / विवरण
पूर्व पाषाण कालसिंघनपुर गुफाएं (पाषाणकालीन शैलचित्रों के लिए प्रसिद्ध)
मध्य पाषाण कालकबरा पहाड़ (रायगढ़)
उत्तर पाषाण कालघनपुर (GPM), महानदी घाटी (रायगढ़)
नव पाषाण कालअर्जुनी (दुर्ग), चितवाडोंगरी (राजनांदगांव) टेरम (रायगढ़), बोनटिला (राजनांदगांव)
पाषाण घेरेबालोद (करहीभदर, चिरचारी, सोरर), कोण्डागांव (गढ़धनौरा)
शैल चित्रकबरा पहाड़, सिंघनपुर, चितवाडोंगरी
पाषाण युग के औजारकबरा पहाड़, सरगुजा जोगीमारा, सीताबेंगरा

रामायण एवं महाभारत काल

  • रामायण काल: छ.ग. का नाम दक्षिण कोसल (राजधानी कुशस्थली), बस्तर का नाम दण्डकारण्य। प्राचीन भाषा कोसली थी। वेदो में बस्तर को दक्षिक दिक कहा गया है।
  • महाभारत काल: छ.ग. का नाम प्राक्‌कोसलं, बस्तर का नाम कान्तार। राजा मोरध्वज का संबंध आरंग और रतनपुर से जोड़ा जाता है।

मौर्य एवं सातवाहन काल

  • मौर्य काल (322-185 ई.पू.): रामगढ़ पहाड़ी के जोगीमारा गुफा में अशोककालीन शिलालेख (नर्तक देवरू व सुतनुका का वर्णन)। कोटाडोर (कोरिया) में मूर्तियाँ। प्राचीन छ.ग. का उत्तरी भाग मौर्य साम्राज्य में था।
  • सातवाहन वंश (72-200 ई.): किरारी ग्राम (जांजगीर-चांपा) के तालाब से काष्ठ स्तंभ प्राप्त (1921 में खोजा, वर्तमान में महंत घासीदास संग्रहालय में)।

गुप्तवंश (319-550 ई.)

  • गुप्तकाल में छ.ग. को 'दक्षिणापथ / दक्षिण कोसल' और दण्डकारण्य को 'महाकान्तार' कहा जाता था।
  • हरिषेण कृत "प्रयाग प्रशस्ति" से: समुद्रगुप्त ने दक्षिण कोसल के वाकाटक राजा महेन्द्र सेन को तथा महाकान्तार के नलवंशीय व्याघ्रराज को हराया था।
  • महासमुन्द के कोपरा नामक ग्राम में समुद्रगुप्त की पत्नी रूपादेवी के साक्ष्य मिले हैं।

छत्तीसगढ़ के क्षेत्रीय राजवंश

राजर्षितुल्य वंश

  • राजधानी: आरंग (रायपुर)।
  • शासन काल: चौथी से छठवीं शताब्दी तक (इस राज्य के प्राचीनकाल में सर्वप्रथम राजवंश था)।
  • स्त्रोत: आरंग ताम्रपत्र (भीमसेन - II)।
  • प्रमुख शासक: 1. सुरा 2. दयित (प्रथम) 3. विभीषण 4. भीमसेन-1 5. दयित (द्वितीय) 6. भीमसेन (द्वितीय)।

नलवंश (4थी से 12 वीं सदी)

  • राजधानी: पुष्करी (भोपालपट्टनम) / कोरापुट (ओडिशा)।
  • संस्थापक: शिशुक (वास्तविक संस्थापक वराहराज)।
  • प्रमुख शासक:
    • व्याघ्रराज: समुद्रगुप्त से पराजित।
    • वराहराज: मुद्रा कोण्डागांव के अडेंगा से मिली।
    • भवदत्त वर्मन: ऋध्दिपुर अभिलेख अनुसार वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को हराया।
    • अर्थपति भट्टारक: केसरीबेड़ा अभिलेख अनुसार वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन से पराजित।
    • स्कन्द वर्मन: पुष्करी को पुनः बसाया एवं पोड़ागढ़ में विष्णु मंदिर बनवाया।
    • विलासतुंग: राजिम अभिलेख (700-740), 7-8 वीं शताब्दी में राजिम में राजीव लोचन मंदिर बनवाया।

शरभपुरीय एवं पाण्डु वंश

शरभपुरीय वंश (5-6वीं सदी ई.)

  • अन्य नाम: अमारार्य कुल/अमरज कुल (वैष्णव धर्म से संबंधित)।
  • राजधानी: शरभपुर (शरभराज), मल्हार / प्रसन्नपुर (प्रसन्नमात्र), सिरपुर (प्रवरराज प्रथम)।
  • प्रमुख शासक:
    • शरभराज: संस्थापक (भानुगुप्त के एरण अभिलेख 510ई. से ज्ञात)।
    • प्रसन्नमात्र: निडिला नदी (लीलागर) के किनारे प्रसन्नपुर (मल्हार) नगर बसाया। गरूड़ चक्र शंख युक्त सोने के सिक्के चलवाये।
    • जयराज: मल्हार ताम्रपत्र के अनुसार दुर्ग शहर की स्थापना की (अन्य नाम मनमात्र और दुर्गराज), मुद्रा पर गज लक्ष्मी का अंकन करवाया।

सोमवंश / पाण्डुवंश (6वीं - 8वीं शताब्दी)

राजधानी: सिरपुर (6-7वीं शताब्दी)। अनुयायी: वैष्णव धर्म。

  • उदयन: पाण्डुवंश का आदिपुरूष एवं संस्थापक (कालंजर शिलालेख)।
  • इंद्रबल: छ.ग. में वास्तविक संस्थापक। इन्द्रपुर (खरौद) बसाया जहां ईशानदेव ने लक्ष्मणेश्वर मंदिर (लाखा चाऊर मंदिर) बनवाया।
  • तीवरदेव: सकलकोसलाधिपति की उपाधि, विस्तार ओडिशा तक किया।
  • हर्षगुप्त: विवाह मौखरी रानी वसाटा से हुआ। वसाटा ने सिरपुर में लाल ईंटों से लक्ष्मण मंदिर बनवाया।
  • महाशिवगुप्त बालार्जुन (595-655 ई.): सर्वाधिक समय तक शासन (शैव धर्म अनुयायी)। इनका काल छ.ग. इतिहास का स्वर्णकाल कहलाता है (धार्मिक सहिष्णुता)। सिरपुर में बौद्ध विहार बनवाये, चीनी यात्री ह्वेनसांग (639 ई.) ने यात्रा की (पुस्तक सी-यू-की में 'किया-स-लो' नाम दिया), लक्ष्मण मंदिर पूर्ण करवाया और अनेक शिव मंदिर बनवाये।

सोम वंश (कलिंग का)

9-11वीं सदी, उपाधि: त्रिकलिंगाधिपति, कौसलेन्द्र。

बाण वंश (900 ई.)

संस्थापक महामण्डलेश्वर मल्लदेव (पाली)। विक्रमादित्य ने पाली के शिव मंदिर का निर्माण कराया। त्रिपुरी के कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय ने इसे समाप्त किया。

छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास (कल्चुरी वंश)

कल्चुरियों की राजधानियां

  • तुम्माण: प्रथम राजधानी (कलिंगराज ने बनाया)।
  • रतनपुर: द्वितीय राजधानी (रत्नदेव प्रथम ने बसाया 1050 ई. में)।
  • छुरी कोसगई: बाहरेन्द्र साय ने रतनपुर के स्थान पर बनाया।
  • रतनपुर वापसी: कल्याण साय पुनः छुरी कोसगई से रतनपुर ले गया।

प्रमुख शासक एवं कार्य

  • कलिंगराज: तुम्माण नगर बसाया। चैतुरगढ़/तुम्माण में महिषासुर मर्दिनी मंदिर बनवाया।
  • रत्नदेव प्रथम: महामाया मंदिर (रतनपुर) 11 वीं शताब्दी में बनवाया।
  • पृथ्वीदेव प्रथम: तुम्माण में पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर। उपाधि: सकलकोसलाधिपति (21 हजार गांव के स्वामी) और प्रचण्डकोसलाधिपति।
  • जाजल्यदेव प्रथम: जाजल्यपुर (जांजगीर) बसाया। छिन्दकनागवंशी सोमेश्वर देव को पराजित किया (गुन्डमहादेवी के अनुरोध पर छोड़ा)। स्वर्ण सिक्के (गजशार्दूल उत्कीर्ण) चलाये। जांजगीर में विष्णु मंदिर (नकटा मंदिर) बनवाया। पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
  • रत्नदेव द्वितीय: त्रिपुरी के गयाकर्ण एवं ओड़िशा के अनंतवर्मन चोड गंगय को पराजित किया।
  • पृथ्वीदेव द्वितीय: राजीव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार (सेनापति जगतपाल द्वारा) कराया।
  • रत्नदेव तृतीय: सेनापति गंगाधर राव द्वारा खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर जीर्णोद्धार।

रायपुर के कल्चुरियों की लहुरी शाखा

  • 14 वीं शताब्दी में वीरसिंह देव के काल में विभाजन। प्रथम शासक केशवदेव (राजधानी खल्लारी)।
  • रामचंद्र देव: रायपुर कल्चुरी वंश के संस्थापक (CG PSC अनुसार)। रायपुर नगर ब्रम्हदेव के नाम पर बसाया।
  • ब्रम्ह देव: राजधानी रायपुर (1409 ई.)। इनके काल में 1415 ई. में खल्लारी में विष्णु मंदिर बना।
  • अमर सिंह लहुरी शाखा के अंतिम शासक थे।

कलचुरी प्रशासन व्यवस्था

राजतंत्र पर आधारित। राज्य गढ़ों (प्रांतो) में विभाजित था। स्थानीय प्रशासन हेतु 'पंचकुल' संस्था बनवाई थी。

कवर्धा के फणीनागवंश एवं प्रमुख स्थापत्य

कवर्धा के फणीनागवंश

  • शासनकाल: लगभग 11 वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक (संस्थापक: अहिराज)।
  • गोपाल देव: 1089 ई. में (11 वीं शताब्दी) चौरा ग्राम में भोरमदेव मंदिर का निर्माण कराया। भोरमदेव को "छत्तीसगढ़ का खजुराहो" कहा जाता है।
  • रामचन्द्र देव: 1349 ई. (14वीं शताब्दी) में चौराग्राम में मड़वा महल (दूल्हा देव) एवं छेरकी महल का निर्माण किया। इनका विवाह कल्चुरी राजकुमारी अंबिकादेवी के साथ हुआ था।
  • मोनिंगदेव: अंतिम फणीनागवंशीय शासक।
राजवंशशासकस्थापत्यस्थानशताब्दी
पांडु वंशरानी वसाटा एवं बालार्जुन / इन्द्रबललक्ष्मण मंदिर / लक्ष्मणेश्वर मंदिरसिरपुर / खरौद7 वीं सदी / 6 वीं सदी
नल वंशविलासतुंगराजीव लोचन मंदिरराजिम7-8वीं सदी
बाण वंशविक्रमादित्यपाली का शिव मंदिरपाली9 वीं सदी
छिंदकनाग वंशसोमेश्वरदेव / धारावर्षशिवमंदिर / विष्णु मंदिरबारसूर11 वीं सदी
फणीनाग वंशरामचन्द्रदेव / गोपालदेवमड़वा महल, छेरकी महल / भोरमदेवचौराग्राम / छपरी ग्राम14 वीं सदी / 11 वीं सदी
सोम वंश (कांकेर)कर्णराज / भानुदेवकर्णेश्वर महादेव / राम मंदिरसिहावा / कांकेर12 वीं सदी
काकतीय वंशअन्नमदेवदंतेश्वरी मंदिरदंतेवाड़ा14 वीं सदी
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🎯 अभी इसी टॉपिक के 5 प्रश्न हल करें (Instant Topic Quiz)

विषय: छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास एवं कलचुरी राजवंश (Kalchuri Dynasty) — ऊपर पढ़े गए नोट्स की तुरंत जाँच करें!

आपका लाइव स्कोर
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अभ्यास प्रश्न #1 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 1: रतनपुर के कलचुरी वंश की स्थापना (1000 ई.) किस शासक ने की थी और उनकी प्रारंभिक राजधानी क्या थी?

अभ्यास प्रश्न #2 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 2: सिरपुर के प्रसिद्ध "लक्ष्मण मंदिर" (लाल ईंटों से निर्मित) का निर्माण किस पांडुवंशीय शासक के काल में प्रारंभ हुआ था?

अभ्यास प्रश्न #3 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 3: कलचुरी काल में छत्तीसगढ़ में "छत्तीस गढ़ों (36 किलों)" का शिवनाथ नदी के आधार पर 18-18 गढ़ों में विभाजन किसके शासनकाल में हुआ?

अभ्यास प्रश्न #4 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 4: किस कलचुरी शासक ने सोने, चांदी और तांबे के सिक्के चलवाए जिन पर "श्रीमद् जाजल्लदेव" एवं "गजशार्दूल" अंकित था?

अभ्यास प्रश्न #5 CGPSC / CG Vyapam Standard (+2.0, -0.66)

प्र. 5: कवर्धा में "भोरमदेव मंदिर" (छत्तीसगढ़ का खजुराहो) का निर्माण 1089 ई. में किस फणीनागवंशीय शासक ने कराया था?

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