प्र. 1: "इत्यादि" और "स्वागत" शब्दों में क्रमशः कौन-सी संधि है?
💡 विस्तृत व्याख्या: जब इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इ का य्, उ का व् और ऋ का र् हो जाता है (यण संधि): इति + आदि = इत्यादि, सु + आगत = स्वागत।
VYAPAM, MPPSC, CGPSC, SI एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए। हिन्दी का इतिहास, वर्ण विचार, सन्धि, समास, शब्द भण्डार (तत्सम/तद्भव, विलोम) और मुहावरों का आकर्षक व रंगीन स्मार्ट नोट्स संकलन।
भाषा परिवार के आधार पर हिन्दी भारोपीय परिवार की भाषा है। भारत में बोलने वालों के प्रतिशत के आधार पर भारोपीय परिवार (73%) सबसे बड़ा भाषा परिवार है (द्रविड़ 25%, आस्ट्रिक 1.3%, चीनी तिब्बती 0.7%)।
| काल (Era) | प्रमुख कवि / रचनाकार | महत्वपूर्ण रचनाएं / विशेषताएं |
|---|---|---|
| आदिकाल (वीरगाथा काल) 1050 - 1350 ई. | चन्दबरदाई, विद्यापति, अमीर खुसरो, सरहपा | चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो)। डिंगल-पिंगल शैली। सिद्धों की संख्या 84 मानी जाती है। |
| भक्तिकाल (स्वर्ण काल) 1350 - 1650 ई. | कबीर (निर्गुण-ज्ञान), जायसी (निर्गुण-प्रेम), सूरदास (सगुण-कृष्ण), तुलसीदास (सगुण-राम) | जायसी (पद्मावत), तुलसीदास (रामचरितमानस)। अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ ने की। |
| रीतिकाल (श्रृंगार काल) 1650 - 1850 ई. | केशवदास, बिहारी, घनानंद, भूषण | केशवदास (रामचन्द्रिका - कठिन काव्य का प्रेत)। घनानंद को प्रेम की पीर का कवि कहा जाता है। |
| आधुनिक काल (भारतेन्दु युग) 1850 - 1900 ई. | भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र | गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रयोग। नवजागरण का काल। |
| द्विवेदी युग 1900 - 1918 ई. | महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध | सरस्वती पत्रिका का सम्पादन। हरिऔध का 'प्रियप्रवास' (खड़ी बोली का पहला महाकाव्य)। |
| छायावाद 1918 - 1936 ई. | जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत | प्रसाद (कामायनी)। महादेवी वर्मा (यामा) को आधुनिक मीरा कहा जाता है। |
| प्रगतिवाद & प्रयोगवाद 1936 - 1951 ई. | मुंशी प्रेमचंद, नागार्जुन, दिनकर, अज्ञेय | अज्ञेय (प्रयोगवाद के प्रवर्तक, तार सप्तक - 1943)। बहुजन सुखाय बहुजन हिताय। |
भाषा कि सबसे छोटी इकाई ध्वनि है और इस ध्वनि को वर्ण कहते है। वर्ण के समूह को वर्णमाला कहते हैं।
मूलतः स्वरों की संख्या 11 है, (अं, अः को मिलाकर 13)।
किसी प्राणी, वस्तु, भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। इसके 5 भेद होते हैं:
संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द। इसके 6 भेद हैं:
संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द। प्रविशेषण वह है जो विशेषण की विशेषता बताए (जैसे- बहुत सुन्दर)। इसके 4 भेद हैं:
काम का करना या होना। कर्म के आधार पर:
| स्वर सन्धि के भेद | नियम / सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. दीर्घ स्वर सन्धि | समान स्वर मिलकर दीर्घ (अ+अ=आ, इ+इ=ई) | विद्या + आलय = विद्यालय, परम + अर्थ = परमार्थ |
| 2. गुण स्वर सन्धि | अ/आ + इ/ई = ए | अ/आ + उ/ऊ = ओ | अ/आ + ऋ = अर् | नर + इन्द्र = नरेन्द्र, महा + उत्सव = महोत्सव |
| 3. वृद्धि स्वर सन्धि | अ/आ + ए/ऐ = ऐ | अ/आ + ओ/औ = औ | मत + ऐक्य = मतैक्य, सदा + एव = सदैव |
| 4. यण स्वर सन्धि | इ/ई + भिन्न स्वर = य् | उ/ऊ + भिन्न = व् | ऋ + भिन्न = र् | अति + अधिक = अत्यधिक, सु + आगत = स्वागत |
| 5. अयादि स्वर सन्धि | ए➔अय्, ऐ➔आय्, ओ➔अव्, औ➔आव् (भिन्न स्वर आने पर) | ने + अन = नयन, पो + अन = पवन, नौ + इक = नाविक |
"तत्पुरुष में विभक्ति, द्वन्द्व में और छिपाया, संख्या वाचक द्विगु, अव्ययी में अव्यय आया..."
जो शब्दांश शब्दों के आदि (प्रारम्भ) में जुड़कर उनके अर्थ में विशेषता लाते हैं।
जो शब्दांश शब्दों के अन्त में जुड़कर उनके अर्थ में परिवर्तन लाते हैं।
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|
| अथ | इति | आकाश | पाताल |
| अनाथ | सनाथ | अवनती | उन्नति |
| आरोह | अवरोह | जंगम | स्थावर |
| तिमिर | प्रकाश | चल | अचल |
| गरिमा | लघिमा | मूक | वाचाल |
| श्रीगणेश | इतिश्री | व्यास | समास |
| अतरंग | बहिरंग | विपन्न | संपन्न |
| नीरस | सरस | उन्मीलन | निमीलन |
| क्षणिक | शाश्वत | ऋजु | वक्र |
| सकाम | निष्काम | आविर्भाव | तिरोभाव |
| शब्द | पर्यायवाची |
|---|---|
| अग्नि | धनञजय, जातवेद, हुताशन, कृषानु, रोहिताश्व, आग, अनल, पावक |
| अनुपम | अद्भुत, अनूठा, अपूर्व, अद्वितीय, अप्रतिम, अनोखा |
| अश्व | हय, बाजि, तुरंग, घोटक, घोड़ा, रविसुत |
| आकाश | गगन, नभ, अम्बर, अनन्त, अन्तरिक्ष, शून्य, अभ्र |
| कमल | जलज्, अरविन्द, इन्दीवर, पंकज, नीरज |
| चन्द्रमा | निशानाथ, इन्दु, शशि, शशांक, सुधाकर |
| जल | तोय, पानी, वारि, नीर, सलिल, अम्बु, पय, जीवन |
| पृथ्वी | धरा, अवनि, क्षिति, वसुधा, मेदिनी, इला |
| सूर्य | आदित्य, भास्कर, दिवाकर, दिनकर, रवि, भानु |
| भौंरा | मधुकर, मधुप, अलि, भृंग, षट्पद |
तत्सम: संस्कृत के शुद्ध शब्द (उज्ज्वल, अक्षि)। तद्भव: परिवर्तित रूप (उजला, आँख)।
| मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| अंक भरना | प्यार से गोद में लेना |
| आँख की किरकिरी होना | आँखों को चुभनेवाला / अच्छा न लगना |
| उड़ती चिड़िया पहचानना | मन की बात जानना |
| एक अनार सौ बीमार | आवश्यकता से अधिक मांग |
| कच्चा चिट्ठा खोलना | सब भेद खोल देना |
| गड़े मुर्दे उखाड़ना | पुरानी बातों पर प्रकाश डालना |
| छक्के छुड़ाना | पूरी तरह से परास्त कर देना |
| जंगल में मंगल होना | निर्जन स्थान में भी आनन्द का मिलना |
| डंके की चोट पर कहना | स्पष्ट घोषणा करना |
| तलवार की धार | सतर्कतापूर्ण जोखिमभरा कार्य |
| न घर का न घाट का | जो कहीं का न हो; जिसका कहीं सम्मान न हो |
विषय: सामान्य हिन्दी व्याकरण (संधि, समास, तत्सम-तद्भव एवं शब्दावली) — ऊपर पढ़े गए नोट्स की तुरंत जाँच करें!
💡 विस्तृत व्याख्या: जब इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो इ का य्, उ का व् और ऋ का र् हो जाता है (यण संधि): इति + आदि = इत्यादि, सु + आगत = स्वागत।
💡 विस्तृत व्याख्या: जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता और दोनों पद मिलकर किसी तीसरे विशेष व्यक्ति/देवता की ओर संकेत करते हैं, वहाँ बहुव्रीहि समास होता है।
💡 विस्तृत व्याख्या: दो भिन्न व्यंजनों के मेल से बनने वाले व्यंजन संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं: क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ), श्र (श् + र)।
💡 विस्तृत व्याख्या: संस्कृत के मूल शब्द तत्सम (हरिद्रा, गोधूम, कर्पूर, गोमल, अग्नि) और उनसे परिवर्तित हिंदी शब्द तद्भव (हल्दी, गेहूँ, कपूर, गोबर, आग) कहलाते हैं।
💡 विस्तृत व्याख्या: जंगल में स्वतः लगने वाली आग को "दावानल / दावाग्नि", समुद्र की आग को "बड़वानल" और पेट की आग को "जठराग्नि / जठरानल" कहते हैं।